डॉ. ज़ेबा रशीद की पुस्तकें
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  • क्योंकि... औरत ने प्यार किया

    "औरत तो उस रोटी सी होती है जिसे भीतर रख दें तो सूख जाती है, और बाहर रख दें तो कौए लूट लेते हैं।"

     

    "औरत... जन्म देती है... फिर भी... माँ... बेटी... बहन... पत्नी... हर रूप में क्यों सताई जाती है औरत....?"

     

    "औरत.... क्यों सुरक्षा और सर की छत के लिए जीवन भर गृहस्थी के पट्टे पर हस्ताक्षर करती है?"

     

    "औरत... सारी उम्र दूसरों के लिए ही तो जीती है। जन्म लेती

Author's Info

डॉ. ज़ेबा रशीद

डॉ. ज़ेबा रशीद

  • जन्म: 7 जनवरी, 1943, जोधपुर, राजस्थान
  • विभिन्न राज्यों से 32 पुरुस्कार
  • पेशे से होमियोपैथी की डॉक्टर होने के बावजूद भी लेखन से अटूट रिश्ता
  • 1968 से ही रचनायें हिन्दी और राजस्थानी भाषा में देश-विदेश की 40 भिन्न-भिन्न पत्रिकाओं में प्रकाशित
  • 1996 से कहानियों और कविताओं का दूरदर्शन पर भी निरंतर प्रसारण
  • उपन्यास: लम्हें की चुभन (1996), क्योंकि औरत ने प्यार किया (2009)
  • कहानी संग्रह: "चिंगारी", "खारी झील", "भीगे पल", "रिश्ते क्या कहलाते हैं" और "कंटीली राहें"
  • काव्य संग्रह: "सरदार समन्द जल आपूर्ति (अनुवाद)" और "संग और मोती"
  • अन्य रचनाएँ: "मारवाड़ के अद्वितीय नरेश" और "मारवाड़ी मुसलमान" (ऐतिहासिक) और "सच-झूठ बोलन में माहिर आँखें" (व्यंग्य लेख)
  • राजस्थानी साहित्य: उपन्यास "नेह री नातौ", कहानी संग्रह "नांव बिहूण रिस्ता", "वाह रै मरद री जात", "मीठी बात" और कविता संग्रह "आभैरी आँख़्यां", "पैली पोथी", "बगत अर बायरौ"