नई पुस्तकें
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  • मन की पीर

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    पोस्टर की पंक्तियाँ पढ़ते हुए संतो ने प्रण किया कि अगर उसे जीत हासिल हुई तो वह अवश्य ही इन सब बातों को पूरा करेगी। इसी के साथ उसे उस दिन की घटना याद हो आई जब दद्दन भइया उसके द्वार पर आये थे और उसे ख़ूब खरी-खोटी सुनाकर वापस लौटे थे। उससे उसे बड़ा दुःख हुआ और शायद नफ़रत भी। वह दद्दन की बड़ी इज़्ज़त करती थी। उन्होंने उस पर बड़े एहसान

  • शिष्टाचार के बहाने

    पुलिस मुहकमे में फरमान जारी हुआ कि वे शिष्टाचार सप्ताह मनाएँगे।
    आम जनता का दहशत में आना लाज़िमी सा हो गया।
    वे किसी भी पुलिसिया हरकत को सहज में लेते नहीं दीखते।
    डंडे का ख़ौफ़ इस कदर हावी है कि सिवाय इसके, वर्दी के पीछे सभ्य सा कुछ दिखाई नहीं देता। पुलिस के हत्थे आप चढ़ गए, तो पुरखों तक के रिकार्ड और फ़ाइल वे मिनटों में डाउनलोड करवा लेते

  • मन्नू की वह एक रात

    …. कह कर मन्नू अपने स्टडी रूम में चली गई। उसे जाते हुए बिब्बो पीछे से देखते रही। उसको देखकर उसने मन ही मन कहा - हूं ..... किताबें ... इन्होंने तुझे भटका दिया बरबाद कर दिया। पर नहीं किताबें तो सिर्फ़ बनाती हैं। किताबों ने तुम्हें नहीं बल्कि सच यह है कि तुमने किताबों को बरबाद किया। वह तो पवित्र होती हैं तुमने उन्हें अपवित्र कर बदनाम किया। एक से एक अनर्थकारी बातें

  • नेता के आँसू

    नेता के आँसू से ....
    एक दिन अख़बारों में एक चौंका देनेवाली ख़बर छपी कि नगर में धड़ल्ले से नेताजी के नक़ली आँसू असली दामों में बेचे जा रहे हैं। इस समाचार से भूचाल-सा आ गया। श्रद्धालु जनता की आस्था पर यह करारी चोट थी। लोगों ने सरकार को चेतावनी दी कि नक़ली आँसुओं के विक्रेताओं को तुरंत गिरफ़्तार करें और कड़ी से कड़ी सज़ा दें। सरकार सक्रिय हुई मगर नतीजा शून्य रहा। लोगों

  • अंतर

    अनिता चुप रही। बस, सिसकने लगी और सारी बात उसकी सिसकियों ने ज़ाहिर कर दी।
     "फिर दोनों हालातों में फ़र्क ही क्या है, कितना अंतर है?" यही प्रश्न रह-रहकर अनिता को झँझोड़ रहा था। और न जाने कब तक निरुत्तर-सी, अनिता, दुनिया से बेख़बर चारपाई पर औंधी पड़ी रही। 
    - (अंतर)
    ***
    "अस्मिता बेटी देखो, हमारी बात को ज़रा ध्यान से सुनो.. लड़का तबीयत का अच्छा है, पढ़ा-लिखा है और अच्छे

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