पुस्तक बाज़ार की पुस्तकें
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  • लाश व अन्य कहानियाँ

    “अरे, यह तो कोई देसी है। देख तो पायल पहने है।”
    “हाय नी! देसी ब्लाँड! ज़रूर ही आवारा है।”
    “ऐंवे ही आवारा-आवारा की रट लगा रही है तू! कैसे जानती है तू कि यह आवारा है?”
    “देखती नहीं तू इसके ब्लाँड बालों को। देसी औरत और ब्लाँड बाल!” पहली ने अपना तर्क दिया।
    “तो क्या बाल रँगने से आवारा हो गयी वो... तू भी तो मेंहदी लगा कर लालो-परी बने घूमती

  • क्या तुमको भी ऐसा लगा

    कवि की मानसिकता पारदर्शी शीशे की तरह होती है। उसकी सारी भावनाएँ, संवेदनाएँ, धारणाएँ कुछ भी छिपते नहीं हैं बल्कि लेखन में उभर कर सामने आते हैं। डॉ. शैलजा सक्सेना की पुस्तक "क्या तुमको भी ऐसा लगा?" में आप पाएँगे कि शैलजा साधारण कवियत्री नहीं है। किसी भी समस्या के लिए भिन्न दृष्टिकोण या अनुभव की प्रतिक्रिया शैलजा की प्रकृति है। परन्तु डॉ. शैलजा की काव्य शैली और भाषा इतनी सहज है कि कविता

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