प्रदीप श्रीवास्तव की पुस्तकें
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  • मन्नू की वह एक रात

    …. कह कर मन्नू अपने स्टडी रूम में चली गई। उसे जाते हुए बिब्बो पीछे से देखते रही। उसको देखकर उसने मन ही मन कहा - हूं ..... किताबें ... इन्होंने तुझे भटका दिया बरबाद कर दिया। पर नहीं किताबें तो सिर्फ़ बनाती हैं। किताबों ने तुम्हें नहीं बल्कि सच यह है कि तुमने किताबों को बरबाद किया। वह तो पवित्र होती हैं तुमने उन्हें अपवित्र कर बदनाम किया। एक से एक अनर्थकारी बातें बता चुकी है और फिर भी कहे जा रही है कि असली अनर्थ अभी बाक़ी है। असली अनर्थ तो लगता है धरती का सीना चीर कर रख देगा। लेकिन ठीक तो यह भी नहीं होगा कि इतना सुनने के बाद आख़िर का असली अनर्थ न जाना जाए। चलो सवेरे जाने से पहले वह भी सुन लूँगी।

     

    ...... पर सवेरे इस तरह जाना ठीक रहेगा क्या?  लाख ख़राब हो अनर्थ किए हों लेकिन आख़िर है तो अपना ही खून, कोई भी तो साथ नहीं है उसके, जिस लड़के के लिए मरती आई वह भी तो नहीं है। पर गोद लिया हुआ है क्या जाने माँ-बाप क्या होते हैं। मगर मेरे तो सगे हैं अपनी ही कोख से जन्म दिया है। कौन पूछ रहा है? चली आई अकेली सोचती रही कि कोई रोकेगा। पर किसी लड़के ने नहीं रोका। यहाँ तक नहीं कहा कि अम्मा अकेले कैसे जाओगी? रुक जाऊँ क्या इसी के पास यह भी अकेली है हर तरफ़ से ठोकर खाई और मैं भी, दोनों साथ जीते हैं जब तक चले।