पुस्तक बाज़ार की पुस्तकें
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  • मेरी कहानियाँ खंड एक

    प्रदीप श्रीवास्तव एक विशेष श्रेणी के कहानीकार हैं। उनके सृजन का कैनवस बहुत विस्तृत है। समाज की विसंगतियों से लेकर भ्रष्ट राजनीति तक; समाज की विकृतियों से लेकर समाज सेवा में अपने प्राण निछावर कर देने की भावना उनकी कहानियों में झलकती है। इस कथा संचयन की कुछ कहानियाँ कोरोना काल की भी हैं। इनमें मानवीय संवेदना की पराकाष्ठा भी देखने को मिलेगी तो दूसरी तरफ़ प्रशासन की अव्यवस्था पर भी करारी चोट करती हुई

  • युग-संधि के इस पार

    मेरी नज़र में इस संग्रह की सभी रचनाओं में कुछ न कुछ संदेश एवं साहित्यिक निष्कर्ष निहित है। मुझे आशा है कि वरिष्ठ कवि लेखक साहित्यकार साहित्यप्रेमी एवं सुधि पाठकों को इस संग्रह की कविताएँ अच्छी लगेंगी वे इसे दिल से पढ़ेंगे और निःसंकोच अपनी सच्ची प्रतिक्रिया भी देंगे। आलोचनाओं एवं सुझावों का विशेष स्वागत है जो आगामी संकलनों में मुझे और बेहतर बनाने में सहायक सिद्ध होंगी।

    — राजनन्दन सिंह

  • नक्सली राजा का बाजा एवं अन्य कहानियाँ

    प्रदीप श्रीवास्तव उन बिरले रचनाकारों में हैं जो घटनाओं और व्यक्तियों के मनोविज्ञान की बारीक़ियों की सूक्ष्म पड़ताल करते हैं। फिर ऐसे परत दर परत खोलते हैं कि आम व्यक्ति हो या शिक्षित, सभी देश को अस्थिर करने की सारी चालें समझ जागरूक होता है। कहानियाँ इसी वज़ह से लंबी होती हैं पर उनमें कसावट, रोचकता और घटनाओं का तेज़ प्रवाह होता है।

    —डॉ. सन्दीप अवस्थी 
    आलोचक, फ़िल्म लेखक

  • मेरे सतरंगी सपने

    शब्द साहित्य का ज्ञान जब आत्मा में प्रतिध्वनित होकर काग़ज़ पर शब्द का रूप लेता है तो, वह सर्जन काव्य कहलाता है। जब मन में विचारों के बादल घुमड़ते हैं तो, सहज ही लिखना अनिवार्य हो जाता है। यह सिर्फ़ एक काव्य संग्रह नहीं बल्कि मेरा सपना है। मेरे मन से निकली आवाज़ है, मैंने उसे अपने काव्य-रूपी माला में पिरोने का प्रयास किया है। 

    — रीता तिवारी ’रीत’

  • कामनाओं का कुहासा

    मैं 1997 से 2000 तक राजस्थान सिन्धी अकादमी का अध्यक्ष था। ‘कामनाओं का कुहासा’ उस कालावधि में हुए कार्यकलापों, आत्ममंथन, आत्मविश्लेषण और दृष्टि पर आधारित उपन्यास है। लेखा-जोखा, रपट या संस्मरण मानकर रचना के उपन्यास तत्त्व को इसलिये गौण नहीं मानना चाहिये क्योंकि उस समय जो नहीं हुआ या नहीं घटा या तकनीक ने जिसे स्पर्श नहीं किया था उसका समावेश भी उपन्यास में हुआ है।

    — भगवान अटलानी

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